सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अधूरे शब्द

गाड़ी छूटने वाली है,
साँस रुकने वाली है !
लहू-लुहान हुँ मैं !
घायल आत्मा है, किंतु धड़क रहा हुँ मैं !
मेरी आँखों में वो प्यास कहाँ ??
जो नदी की तरह बहती है !
किससे पूछूं,
किससे न पूछूं ??
तुम इस समय के लिए हो जरूर !
मगर अफसोस यह समय तुम्हारा नहीं है !!
गाड़ी छूटने वाली है,
साँस रुकने वाली है !!
हमेशा के लिए नष्ट कर दूँ !
तुम्हारी पुरानी पहचान,
अब पता चला भोर होने वाली है !!
बचा रखा है,
कुछ बारिश की बूँदें,
कुछ ओस की नमी,
कुछ अधूरे शब्द
कुछ एहसास,
कुछ खामोशी,
कुछ दर्द,
अब पता चला भोर होने वाली है !
गाड़ी छूटने वाली है,
साँस रुकने वाली है !!
कैसा उलझन में हुँ, मैं ??
तुम्हारी यही अंश की बात
दिल को चुभ जाती है !
मेरी सोच, मेरे एहसास
जैसा हवा से, नदी से,
आकाश से,
मैं तुमसे इतना दूर ,
तो तुमसे इतनी मिलती क्यों है ??
A SECRET MOUNTAIN BOY
©Navinkishor 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ब्लॉक लव

मोहब्बत के लिए कोई परिभाषा ली ही नहीं गयी,  क्योंकि ये हर इंसान के लिए अलग अलग होता है,  शायद आपके लिए अलग है, उसके लिए अलग है  दिल में जो एहसास है, वो वैसा ही होता है l  इस कहानी की शुरुआत है, वहीं से जहाँ से जिन्दगी की सबसे खूबसूरत दिन शुरू होते हैं l  हाँ बचपन के दिन, आज सोमवार हैं, न !! हाँ लोग कहते हैं पहला प्यार कभी नहीं भूलते, कितने साल बीत गए, लेकिन उसे अब भी याद है उसने क्या पहना था !!  आज भी जैसे हर रात सोने से पहले उसके प्रोफ़ाइल पिक्चर को देख के सोना, कि इस आशा में आज अनब्लॉक कर दी शायद !!  हाँ, मुझे पता है, जब तुम रात के 1 बजे उसे ऑनलाइन देख, कैसे छटपटाते थे l जैसे कोई शिकारी तीर से चिड़ियाँ को मारने के बाद जमीं पर छटपटाती है l  बस अंतर इतना था, तुम बिस्तर पर थे l लेकिन अंतर्मन में वेदना शायद उससे ज्‍यादा हुआ हो l  आज रात भी सोने से पहले, यही एक सवाल पूछेगा, जो पिछले कई रातों से पूछ रहा है ???? वो खुश तो है, ना !!

मेरा जीवन

मुझे अपने बचपन के बारे में ज्यादा कुछ याद नहीं l मुझे याद है, मेरी माँ मुझे बैठाकर बता रही थी, कि हर चीज़ का एक राज होता है  l पहले तो उसे मैं नहीं देख पाया था, लेकिन फिर एक दिन मैंने देखा लोग अपने आस-पास के राज़ पर गौर नहीं करते, जबकि वो ठीक उनके सामने होते हैं l छुपकर ढूंढें जाने का इंतजार करते हैं, सूरज उगने से पहले कितना सन्नाटा होता है l इतनी सुबह मैं बाहर बैठता हुँ, कुछ लिखता हुँ, जैसे कहानियाँ, कविताएँ, बहुत आसान है l पता नहीं मेरे ख्याल से शायद दिन के उस समय में जब सब सो रहे होते हैं l तब मन में बहुत से अच्छे ख्याल आते हैं l ( मेरी डायरी के पन्नों से )

मुझे कुछ कहना था ?

मुझे कुछ कहना था, आपसे ?   मगर कह न सका ! सोचता रहा, समय, स्थान ओर वज़ह तलाशता रहा !  कभी आप मिले तो, चुपचाप खड़ा रहा, बेआवाज़ बोलता रहा ! कभी आप आगे बढ़ गये, कभी शब्द मेरे छोटे पड़ गये ! मैं भी अजीब हुँ, डर डर के आपसे प्यार करता रहा !! बात करने के लिए समय तलाशता रहा ! सोचा था आपसे मिलकर  पुराने दिनों की बातें फिर से करूँ !!  पुराने दिनों की याद दिलाऊं !! मगर जब आपकी आँखों में देखा तो सारे ख्वाब ढह गये !!  आप बस आईना बन कर रह गयी !!  मेरा आवेग, संवेग आपकी याद थी !!  ओर आपका युँ बेरुखीपन  हमें साथ साथ चलने न दिया  एक साथ फिर मिलने न दिया पानी तो पानी ही रहा,  हम अलग अलग द्वीप बनकर रह गये  मेरी मजबूरियाँ भी कुछ कम न थीं, लंगड़े शब्द मेरे अब बोलने में सक्षम नहीं !!  सुना है, जब जुबां साथ नहीं देती है !! आँखें बोलती है ?  बहुत पुकारा बंद आंखों से मगर  आँख खुली तो आप नहीं थे !!  आपके साये मेरे साथ हमेशा के लिए रह गए !! मुझे कुछ कहना था आपसे ?             ...